The Hell Race: चारों ओर फैला अंधेरा।
दूर-दूर तक सन्नाटा।
रेगिस्तान की ठंडी हवा के बीच अचानक सुनाई देती अजीब-सी आवाज़ें।
थका हुआ शरीर, जवाब देता मन और आगे बढ़ने का सिर्फ़ एक ही मकसद — हार नहीं माननी।
ये अनुभव हैं अहमदाबाद के डॉक्टर दंपति डॉ. चिंतन सेठ और डॉ. तेजस्वीनी सेठ के, जिन्होंने भारत की सबसे खतरनाक अल्ट्रा-एंड्योरेंस रेस The Hell Race को न सिर्फ़ पूरा किया, बल्कि इतिहास भी रच दिया।
राजस्थान के जैसलमेर के थार रेगिस्तान में आयोजित इस रेस में 161 किलोमीटर की दूरी तय करना किसी भी इंसान के लिए असंभव-सा लगता है। लेकिन इस डॉक्टर कपल ने अपनी इच्छाशक्ति, अनुशासन और कड़ी मेहनत के दम पर इस “नर्क जैसी दौड़” को जीत में बदल दिया। वे गुजरात के पहले और भारत के दूसरे ऐसे कपल बन गए हैं, जिन्होंने 100 मील यानी 161 किलोमीटर की कैटेगरी सफलतापूर्वक पूरी की।
यह सिर्फ़ एक रेस नहीं थी, बल्कि इंसान की शारीरिक और मानसिक सीमाओं की असली परीक्षा थी।
क्या है The Hell Race? क्यों इसे भारत की सबसे खतरनाक दौड़ माना जाता है
नाम ही काफी है — The Hell Race।
यह कोई सामान्य मैराथन नहीं, बल्कि एक ऐसी अल्ट्रा-मैराथन है जिसे पूरा करना अनुभवी एथलीट्स के लिए भी आसान नहीं होता।
इस रेस का आयोजन भारत के सबसे दुर्गम इलाकों में किया जाता है — कभी हिमालय की ऊँचाइयों में, तो कभी राजस्थान के तपते रेगिस्तान में। जैसलमेर से लोंगेवाला बॉर्डर तक आयोजित होने वाली यह रेस देश की सबसे कठिन एंड्योरेंस चुनौतियों में गिनी जाती है।
शहीदों को श्रद्धांजलि से जुड़ा उद्देश्य
The Hell Race की शुरुआत साल 2018 में हुई थी। इसका मकसद 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देना है। लोंगेवाला की ऐतिहासिक लड़ाई में भारतीय सेना के सीमित जवानों ने दुश्मन के हज़ारों सैनिकों और टैंकों का डटकर मुकाबला किया था।
उसी वीरता और साहस की याद में जैसलमेर से लोंगेवाला बॉर्डर तक यह 100 मील की दौड़ कराई जाती है।
रेस की तीन कैटेगरी और खौफनाक समय सीमा
The Hell Race को तीन अलग-अलग कैटेगरी में बांटा गया है:
- 50 किलोमीटर — 8 घंटे में
- 100 किलोमीटर — 16 घंटे में
- 161 किलोमीटर (100 मील) — 28 घंटे में
डॉ. चिंतन और डॉ. तेजस्वीनी ने सबसे कठिन कैटेगरी यानी 161 किलोमीटर को चुना।
इस साल देशभर से 1200 से अधिक प्रतिभागियों ने रेस में हिस्सा लिया।
161 किलोमीटर की कैटेगरी में ही 300 से ज्यादा धावक शामिल थे, लेकिन फिनिश लाइन तक पहुंचने वालों की संख्या बहुत कम रही।
क्यों लिया The Hell Race में हिस्सा लेने का फैसला
डॉ. चिंतन सेठ पेशे से एनेस्थिसियोलॉजिस्ट हैं और पिछले आठ वर्षों से रनिंग से जुड़े हुए हैं। उनकी पत्नी डॉ. तेजस्वीनी भी फिटनेस और एंड्योरेंस रनिंग को लेकर बेहद समर्पित हैं।
डॉ. चिंतन बताते हैं,
“हम दोनों पहले ही दो बार 100 किलोमीटर की रेस पूरी कर चुके थे। उससे आत्मविश्वास बढ़ा और लगा कि अब खुद को और आगे तक ले जाना चाहिए।”
इंटरनेट पर खोज करते समय उन्हें The Hell Race के बारे में पता चला। रेस का विवरण पढ़ते ही साफ था कि यह कोई साधारण चुनौती नहीं है।
“वेबसाइट पर साफ लिखा था — यह ‘Do or Die’ रेस है। यहां आपको नर्क जैसा अनुभव होगा। यही लाइन हमारे दिमाग में बस गई।”
100 किलोमीटर की जगह 161 किलोमीटर क्यों चुनी
डॉ. तेजस्वीनी बताती हैं कि वे शुरू में 100 किलोमीटर की रेस में हिस्सा लेना चाहती थीं। लेकिन जब रजिस्ट्रेशन खुला, तब तक 100 किलोमीटर की कैटेगरी फुल हो चुकी थी।
“केवल 161 किलोमीटर की कैटेगरी बची थी। हमने अपने मेंटर अमित भट्टाचार्य से बात की। उन्होंने मुस्कुराकर कहा — रजिस्टर कर लो।”
दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।
161 किलोमीटर — वह भी रेगिस्तान में।
लेकिन वहीं फैसला हो गया।
नौ महीने की कड़ी तैयारी, अनुशासन और तपस्या
The Hell Race में उतरना बिना तैयारी आत्मघाती कदम होता।
डॉ. चिंतन बताते हैं कि रजिस्ट्रेशन के तुरंत बाद उन्होंने 9 महीने पहले से ट्रेनिंग शुरू कर दी।
- शुरुआत में हफ्ते में 20–25 किमी रन
- धीरे-धीरे दूरी बढ़ाकर 30–35 किमी
- रविवार को लॉन्ग रन
- योग, मेडिटेशन और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग
- न्यूट्रिशन और हाइड्रेशन पर सख्त नियंत्रण
हर हफ्ते कोच द्वारा तय किया गया सटीक शेड्यूल फॉलो किया गया।
दोपहर की आग और रात की बर्फ जैसी ठंड
रेस दोपहर 12 बजे शुरू हुई।
थार रेगिस्तान में दिन का तापमान 35 डिग्री था, लेकिन खुला मैदान होने की वजह से यह 45 डिग्री जैसा महसूस हो रहा था।
जैसे-जैसे रात हुई, तापमान 10 डिग्री तक गिर गया, लेकिन शरीर को यह 3–4 डिग्री जैसा चुभ रहा था।
दिन और रात का यह चरम अंतर शरीर को तोड़ देता है।
पहले 50 किलोमीटर: आसान शुरुआत, कठिन सफर की आहट
रेस की शुरुआत में सभी रनर साथ थे। माहौल उत्साह से भरा था। पहले 50 किलोमीटर अपेक्षाकृत आसान लगे, लेकिन डॉ. चिंतन कहते हैं कि असली चुनौती हाइड्रेशन और न्यूट्रिशन को बैलेंस करना था।
“हर घंटे मुझे 60–70 ग्राम ग्लूकोज, 1.5–2 ग्राम सोडियम और 2 लीटर पानी की जरूरत थी।”
रात का सन्नाटा और डरावनी आवाज़ें
100 किलोमीटर के बाद हालात बदलने लगे।
डॉ. तेजस्वीनी बताती हैं,
“चारों ओर घना अंधेरा था। इतनी शांति थी कि छोटी-सी आवाज़ भी डराने लगती थी। कभी लगता था कोई पीछे है, लेकिन हेडलाइट घुमाने पर कोई नहीं दिखता।”
थकान अपने चरम पर थी। शरीर जवाब देने लगा था। पैर में चोट के कारण दर्द असहनीय हो गया।
25 मिनट दौड़, 5 मिनट पैदल: जीवन बचाने वाली रणनीति
डॉ. चिंतन और डॉ. तेजस्वीनी ने शुरुआत से ही एक रणनीति अपनाई थी:
- 25 मिनट रन
- 5 मिनट वॉक
75 किलोमीटर तक यही पैटर्न चला। इसके बाद वॉक का समय बढ़ाना पड़ा।
हर 10 किलोमीटर पर रिलैक्सेशन स्टेशन थे, जहां मेडिकल और न्यूट्रिशन सपोर्ट मिलता था।
130 किलोमीटर के बाद शुरू हुआ असली संघर्ष
डॉ. चिंतन बताते हैं कि 130 किलोमीटर के बाद सांस फूलने लगी, शरीर कांपने लगा और गति धीमी करनी पड़ी।
“यहीं हमने तय किया कि तेजस्वीनी आगे जाए और मैं अपनी रफ्तार से चलता रहूं।”
यह मानसिक रूप से सबसे कठिन फैसला था।
आखिरी 10 किलोमीटर: नींद, डर और उम्मीद
डॉ. तेजस्वीनी के लिए आखिरी 10 किलोमीटर सबसे चुनौतीपूर्ण थे। नींद आने लगी थी। पति का फोन बंद होने से चिंता और बढ़ गई।
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
एक-एक रनर को पीछे छोड़ते हुए आखिरकार उन्होंने फिनिश लाइन पार कर ली।
डॉ. चिंतन ने लगभग एक घंटे बाद रेस पूरी की।
“यह नर्क की रेस नहीं, मेरे लिए स्वर्ग की रेस थी”
फिनिश लाइन के 300 मीटर पहले जब डॉ. चिंतन ने लक्ष्य देखा, तो थकान गायब हो गई।
“दुनिया की कोई खुशी उस पल से बड़ी नहीं थी। लोग इसे The Hell Race कहते हैं, लेकिन मेरे लिए यह स्वर्ग की रेस बन गई।”
दौड़ ने बदली जिंदगी
डॉ. चिंतन बताते हैं कि आठ साल पहले वे ठीक से चलते भी नहीं थे। वजन बढ़ चुका था, ब्लड प्रेशर की दिक्कत थी।
रनिंग शुरू करने के एक साल के भीतर दवाइयां बंद हो गईं।
डॉ. तेजस्वीनी कहती हैं कि मां बनने के बाद भी उन्होंने रोज़ 45 मिनट दौड़ने की आदत नहीं छोड़ी।
शहीदों को श्रद्धांजलि का माध्यम
The Hell Race का आयोजन पूर्व सैनिक विश्वास द्वारा किया जाता है। इसका उद्देश्य 1971 के युद्ध में शहीद जवानों को सम्मान देना है।
यह सिर्फ़ एक रेस नहीं, बल्कि साहस, समर्पण और देशभक्ति का प्रतीक है।
निष्कर्ष
अहमदाबाद के इस डॉक्टर दंपति की कहानी साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो रेगिस्तान की खामोशी, डरावनी आवाज़ें और 161 किलोमीटर का सफर भी इंसान को नहीं रोक सकता।
The Hell Race उनके लिए सिर्फ़ एक दौड़ नहीं, बल्कि जीवन बदलने वाला अनुभव बन गई।












