गुजरात और राजस्थान के 14,753 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में सोलर पार्क और पवन चक्कियों पर रोक
नई दिल्ली:
Great Indian Bustard: भारत की न्यायिक और पर्यावरणीय इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ लाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विलुप्ति के कगार पर खड़े Great Indian bustard (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) के संरक्षण के लिए कड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। इस निर्णय के तहत गुजरात और राजस्थान के कुल 14,753 वर्ग किलोमीटर संवेदनशील क्षेत्रों में नए सोलर पावर पार्क, पवन चक्कियां और ओवरहेड हाई-टेंशन बिजली लाइनों के निर्माण पर रोक लगा दी गई है।
यह फैसला केवल एक पक्षी प्रजाति के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की नई परिभाषा भी तय करता है।
क्या है Great Indian Bustard और क्यों है यह संकट में?
Great Indian bustard (Ardeotis nigriceps) भारत का एक अत्यंत दुर्लभ और विशालकाय पक्षी है, जो मुख्य रूप से राजस्थान के थार मरुस्थल और गुजरात के कच्छ क्षेत्र में पाया जाता है। इसे स्थानीय भाषाओं में गोडावण और घोराड कहा जाता है तथा “रेगिस्तान का मोती” भी कहा जाता है।
यह पक्षी तीन फीट से अधिक ऊँचा और लगभग 18 किलो वज़नी होता है। आकार में विशाल होने के बावजूद इसकी उड़ान क्षमता अद्भुत है, लेकिन इसकी आंखों की संरचना ऐसी होती है कि यह सामने फैली बिजली की तारों को समय रहते देख नहीं पाता। यही वजह है कि उड़ान के दौरान हाई-टेंशन लाइनों से टकराकर इसकी मृत्यु हो जाती है।
आज स्थिति यह है कि दुनिया भर में Great Indian bustard की संख्या 150 से भी कम रह गई है, जिससे यह प्रजाति गंभीर रूप से विलुप्त होने की कगार पर है।
सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुँचा मामला?
पूर्व IAS अधिकारी और भारत के वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के प्रमुख निर्माताओं में से एक एम. के. रणजीतसिंह ने वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उनके साथ 12 से अधिक वन्यजीव प्रेमी और संस्थाएं जुड़ीं।
याचिका में बताया गया कि राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी इलाकों में तेजी से बन रहे सोलर पावर प्लांट, विंड फार्म और हाई-टेंशन लाइनें Great Indian bustard के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी हैं।
कोर्ट ने इस मामले में Wildlife Institute of India (WII) समेत कई विशेषज्ञ संस्थाओं से वैज्ञानिक रिपोर्ट मंगवाई।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसने सुनाया?
इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की पीठ ने की। विशेषज्ञ रिपोर्टों, वैज्ञानिक आंकड़ों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर कोर्ट ने यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया।
किन इलाकों को “प्रायोरिटी एरिया” घोषित किया गया?
राजस्थान: 14,013 वर्ग किलोमीटर
राजस्थान में Great Indian bustard के मुख्य आवास वाले क्षेत्रों को प्रायोरिटी एरिया घोषित किया गया है, जिनमें शामिल हैं:
- डेज़र्ट नेशनल पार्क
- पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज (PFFR)
- रामदेवरा क्षेत्र
- सलखा-कुचरी घास के मैदान
- सानू-मोकला-पारेवर क्षेत्र
- धोलिया, खेतोलाई, चाचा, ओढानिया और आसपास के गांव
गुजरात: 740 वर्ग किलोमीटर
गुजरात में कच्छ जिले के नलिया घास के मैदान और उससे जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है।
सोलर पार्क और पवन चक्कियों पर सख्त रोक
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि:
- इन प्रायोरिटी क्षेत्रों में नई पवन चक्कियां नहीं लगाई जाएंगी
- 2 मेगावाट से अधिक क्षमता वाले सोलर प्लांट प्रतिबंधित रहेंगे
- केवल स्थानीय ज़रूरतों के लिए 2 MW से छोटे प्रोजेक्ट को सीमित अनुमति मिलेगी
यह फैसला बड़े रिन्यूएबल एनर्जी कॉरपोरेट प्रोजेक्ट्स पर सीधा असर डालेगा।
बिजली लाइनों को भूमिगत करने का आदेश
कोर्ट ने Wildlife Institute of India द्वारा चिन्हित 250 किलोमीटर की अत्यधिक खतरनाक बिजली लाइनों को लेकर अहम आदेश दिया है:
- इन सभी लाइनों को 2 साल के भीतर अंडरग्राउंड करना होगा
- राजस्थान में 80 किमी और गुजरात में 79.2 किमी की 33 kV लाइनें तुरंत भूमिगत या रीरूट होंगी
- तकनीकी कठिनाइयों को बहाना नहीं माना जाएगा
विशेष “पावर कॉरिडोर” को मिली मंजूरी
डेज़र्ट नेशनल पार्क के दक्षिण में 5 किलोमीटर चौड़ा विशेष पावर कॉरिडोर बनाने की अनुमति दी गई है, ताकि भविष्य की सभी बिजली लाइनें एक ही मार्ग से गुजरें और पक्षियों के लिए खतरा कम हो।
गुजरात के लिए विशेष ‘Jump Start’ योजना
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में Great Indian bustard की संख्या बढ़ाने के लिए विशेष सुझाव दिए हैं:
- राजस्थान से उपजाऊ अंडे गुजरात लाने की अनुमति
- पक्षियों का GPS टैगिंग
- नियंत्रित प्रजनन कार्यक्रम
- आवास सुधार और संरक्षण
CSR की परिभाषा बदल दी कोर्ट ने
कोर्ट ने अपने फैसले के पैरा 38 में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) पर बेहद सख्त टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा:
- पर्यावरण संरक्षण दान नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है
- संविधान के अनुच्छेद 51A(g) के तहत हर नागरिक और कंपनी का दायित्व है
- कंपनियां केवल सामाजिक कार्यक्रम कर जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं
- Environmental Responsibility भी CSR का अनिवार्य हिस्सा है
Polluter Pays Principle लागू
सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि:
- जिन कंपनियों के प्रोजेक्ट से पर्यावरण या वन्यजीवों को नुकसान होता है
- उसी कंपनी को संरक्षण का खर्च उठाना होगा
JSW और ACME जैसी सोलर कंपनियों की दलीलों के बावजूद कोर्ट ने Great Indian bustard के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
2021 के ब्लैंकेट बैन में संशोधन
2021 में सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 99,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ओवरहेड लाइन पर रोक लगाई थी। कंपनियों ने इसे अव्यावहारिक बताया।
इसके बाद वैज्ञानिक अध्ययन कर 14,753 वर्ग किलोमीटर को संशोधित प्रायोरिटी एरिया घोषित किया गया, जिससे ग्रीन एनर्जी और वाइल्डलाइफ संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे।
बिजली की तारें क्यों बनती हैं मौत का कारण?
कोर्ट ने माना कि:
- Great Indian bustard सामने की पतली तारें नहीं देख पाता
- टकराव से तुरंत मृत्यु हो जाती है
- बिश्नोई समाज इस पक्षी को पवित्र मानता है
- यह राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है
“सालों की लड़ाई के बाद मिली जीत”-एम. के. रणजीतसिंह
एम. के. रणजीतसिंह ने इस फैसले को वन्यजीव संरक्षण के लिए ऐतिहासिक जीत बताया। उन्होंने कहा:
“हम वर्षों से इस पक्षी को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। आज अदालत ने यह साबित कर दिया कि विकास का मतलब विनाश नहीं होता।”
क्यों ऐतिहासिक है यह फैसला?
यह निर्णय इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि:
- पहली बार रिन्यूएबल एनर्जी को भी पर्यावरणीय जवाबदेही में बांधा गया
- CSR को संवैधानिक कर्तव्य से जोड़ा गया
- Great Indian bustard के लिए कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित हुई
- भारत में पर्यावरण न्याय का नया मानक स्थापित हुआ
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निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण और जैव विविधता की रक्षा का मजबूत संदेश है।
अगर यह निर्णय सही तरीके से लागू हुआ, तो Great Indian bustard को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है-और यही इस ऐतिहासिक फैसले की सबसे बड़ी जीत है।













