Aravalli protests: अगर ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ ढह गई तो क्या दिल्ली रेगिस्तान बन जाएगी? जानिए पूरा विवाद

📝 Last updated on: December 22, 2025 1:59 pm
Aravalli protests

Aravalli protests: भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की नई कानूनी परिभाषा तय किए जाने के बाद देश के कई हिस्सों में Aravalli protests तेज हो गए हैं। पर्यावरणविदों, जल विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यह फैसला अगर ज़मीन पर गलत तरीके से लागू हुआ, तो इसके परिणाम दिल्ली-एनसीआर के लिए विनाशकारी साबित हो सकते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है
अगर अरावली का बड़ा हिस्सा जंगल की श्रेणी से बाहर हो गया, तो क्या देश की राजधानी दिल्ली धीरे-धीरे रेगिस्तान में बदल सकती है?

जब ‘खामोश पहाड़’ बोलने लगते हैं

“कभी-कभी बेज़ुबान पहाड़ भी बोलते हैं, और जब पहाड़ बोलते हैं तो दिल कांप उठते हैं।”

ये पंक्तियाँ दशकों पहले एक फ़िल्मी गीत में लिखी गई थीं, लेकिन आज वे हकीकत बन चुकी हैं। अरावली के पहाड़ अब सचमुच बोल रहे हैं-Aravalli protests के ज़रिये, सड़कों पर उतरते लोगों की आवाज़ के ज़रिये और सूखते जलस्त्रोतों के ज़रिये।

खनन, अवैध निर्माण और अंधाधुंध शहरीकरण ने अरावली को पहले ही गंभीर रूप से घायल कर दिया है। अब आशंका है कि नई परिभाषा इसके बचे-खुचे हिस्सों को भी असुरक्षित बना देगी।

Aravalli protests

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और विवाद की जड़

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर एक अहम कानूनी स्पष्टता दी। इस फैसले के अनुसार:

  • केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाले पहाड़ ही अरावली पर्वत श्रृंखला माने जाएंगे
  • इससे कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ, चट्टानें और वन क्षेत्र इस परिभाषा से बाहर हो सकते हैं
  • भूमि की पहचान अब ऊँचाई के साथ-साथ राजस्व रिकॉर्ड, सरकारी अधिसूचनाओं और ज़मीनी स्थिति के आधार पर होगी

कानूनन इसे “स्पष्टता” कहा गया, लेकिन पर्यावरण संगठनों का कहना है कि खतरा फैसले से नहीं, उसके क्रियान्वयन से है

क्यों भड़के Aravalli protests?

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि अरावली केवल ऊँचे पहाड़ों की कतार नहीं है, बल्कि यह एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र (ecosystem) है, जिसमें शामिल हैं:

  • छोटी-छोटी पहाड़ियाँ
  • वन क्षेत्र
  • घास के मैदान
  • जलग्रहण क्षेत्र
  • चट्टानी भू-भाग

अगर इनमें से किसी एक हिस्से को भी कानूनी सुरक्षा से बाहर किया गया, तो पूरा तंत्र कमजोर हो जाएगा।

Save Aravalli Trust से जुड़े जितेंद्र भड़ाना का कहना है:

“नई परिभाषा से अरावली का बहुत बड़ा हिस्सा कागज़ों में गैर-वन क्षेत्र बन सकता है। इसके बाद खनन और निर्माण को रोकना बेहद मुश्किल हो जाएगा।”

दिल्ली का कितना हिस्सा अरावली पर बसा है?

बहुत कम लोग जानते हैं कि दिल्ली का लगभग 20 से 25 प्रतिशत क्षेत्र अरावली की चट्टानों पर स्थित है

दिल्ली के प्रमुख इलाके जो अरावली से जुड़े हैं:

  • मेहरौली
  • साकेत
  • वसंत कुंज
  • छतरपुर
  • द्वारका के कुछ हिस्से

एनसीआर में:

  • गुरुग्राम
  • फरीदाबाद
  • मानेसर
  • दक्षिण सोनीपत

इन इलाकों में अरावली न केवल जलस्रोतों की रक्षा करती है, बल्कि बाढ़, गर्मी और प्रदूषण से भी सुरक्षा देती है।

गुरुग्राम-फरीदाबाद में सड़कों पर उतरे लोग

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद Aravalli protests हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर में तेज़ हो गए। गुरुग्राम में स्थानीय लोगों ने राज्य मंत्री राव नरबीर सिंह के आवास के बाहर प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों के नारे थे:

  • Save Aravalli, Save Future
  • No Aravalli, No Water
  • Stop Desertification
  • Mountains Are Not Real Estate

लोगों का कहना है कि यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन और भविष्य का सवाल है।

दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक

अरावली पर्वत श्रृंखला सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी आयु दो अरब वर्ष से भी अधिक है।

यह श्रृंखला:

  • गुजरात के कच्छ से शुरू होकर
  • राजस्थान से गुजरती है
  • हरियाणा और
  • दिल्ली तक फैली हुई है

लगभग 800 किलोमीटर लंबी यह श्रृंखला सदियों से पश्चिमी भारत की जीवनरेखा रही है।

अरावली की जैव विविधता: एक अनदेखा खजाना

अरावली क्षेत्र कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों का घर है, जिनमें शामिल हैं:

  • भेड़िए
  • सियार
  • लकड़बग्घा
  • बंगाल लोमड़ी
  • कैराकल
  • सैकड़ों पक्षी प्रजातियाँ
  • औषधीय पौधे

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अरावली के जंगल टूटे, तो ये प्रजातियाँ हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं।

दिल्ली-एनसीआर का जल भंडार: अरावली

अरावली की सबसे अहम भूमिका है भूजल रिचार्ज

अध्ययनों के अनुसार:

  • अरावली हर साल प्रति हेक्टेयर लगभग 20 लाख लीटर भूजल रिचार्ज करती है

अगर यह प्रणाली नष्ट हुई:

  • कुएँ सूख जाएंगे
  • बोरवेल फेल होंगे
  • पानी के टैंकर पर निर्भरता बढ़ेगी
  • पानी महँगा होगा
  • सामाजिक असमानता बढ़ेगी

दिल्ली पहले ही गंभीर जल संकट से जूझ रही है।

यमुना पर बढ़ेगा दबाव

भूजल खत्म होने पर शहरों को सतही जल स्रोतों, खासकर यमुना नदी, पर निर्भर होना पड़ेगा। जबकि यमुना पहले से ही अत्यधिक प्रदूषित है।

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • कोई भी नदी भूजल का विकल्प नहीं हो सकती
  • अरावली के बिना यमुना पर दबाव कई गुना बढ़ जाएगा

थार रेगिस्तान से ढाल

अरावली सदियों से थार रेगिस्तान को दिल्ली की ओर बढ़ने से रोकती आई है। यह रेत, धूल और गर्म हवाओं के लिए एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है।

अगर अरावली कमजोर हुई:

  • रेगिस्तान आगे बढ़ेगा
  • भूमि बंजर होगी
  • तापमान बढ़ेगा

राजस्थान के कई इलाकों में जहां अरावली नष्ट हुई है, वहां यह असर पहले ही दिखने लगा है।

गर्मी, प्रदूषण और बाढ़ का खतरा

अरावली:

  • धूल को रोकती है
  • तापमान संतुलित करती है
  • वर्षा जल को नियंत्रित करती है

इसके बिना:

  • दिल्ली-एनसीआर में हीटवेव बढ़ेंगी
  • वायु प्रदूषण और खराब होगा
  • गुरुग्राम और फरीदाबाद में शहरी बाढ़ का खतरा बढ़ेगा

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

ग्रीन पेंसिल फाउंडेशन के संस्थापक और पर्यावरण कार्यकर्ता सैंडी खंडा का कहना है:

“दिल्ली-एनसीआर पहले ही जल संकट की कगार पर है। अरावली बारिश के पानी को रोककर ज़मीन में समाने देती है। अगर ये पहाड़ खत्म हुए, तो पानी भी खत्म हो जाएगा।”

विकास बनाम अस्तित्व की लड़ाई?

कुछ लोग इसे विकास के खिलाफ बताते हैं, लेकिन पर्यावरणविदों का साफ कहना है:

जो विकास पानी, हवा और जीवन को नष्ट करे, वह विकास नहीं, विनाश है।

Aravalli protests इसी सोच का परिणाम हैं — लोग अब समझने लगे हैं कि पर्यावरण संरक्षण उनके अपने अस्तित्व से जुड़ा है।

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क्या अरावली को अब भी बचाया जा सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तुरंत कदम उठाए जाएँ तो अरावली को बचाया जा सकता है:

  • अवैध खनन पर सख्त रोक
  • वन क्षेत्रों की बहाली
  • पारदर्शी भूमि रिकॉर्ड
  • स्वतंत्र पर्यावरण ऑडिट

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निष्कर्ष: भविष्य का फैसला आज होगा

अरावली अरबों सालों से खड़ी है। सवाल यह है कि क्या वह आधुनिक लालच, अनियंत्रित विकास और कमजोर नीतियों के सामने टिक पाएगी?

Aravalli protests सिर्फ पहाड़ों की रक्षा की लड़ाई नहीं है। यह लड़ाई है:

  • पानी की
  • हवा की
  • जलवायु की
  • और आने वाली पीढ़ियों की

अगर ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ ढह गई, तो इसका असर सिर्फ नक्शों पर नहीं, बल्कि हर इंसान की ज़िंदगी पर पड़ेगा।

पहाड़ बोल रहे हैं।
अब फैसला हमें करना है-सुनना है या अनसुना करना है।