President Zelensky to visit India: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा को अभी एक सप्ताह भी नहीं बीता है और भारत अब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की के स्वागत की तैयारी कर रहा है। यह दौरा भारत की सावधानीपूर्वक संतुलित कूटनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि देश न केवल तटस्थ रहना चाहता है, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच शांति स्थापना में भी सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। विशेषज्ञ अब यह देख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस यात्रा के दौरान शांति और संवाद के लिए क्या पहल करेंगे और इसका वैश्विक स्तर पर क्या महत्व होगा।
राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की यात्रा का समय और पृष्ठभूमि
राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के भारत आने का विचार पिछले साल तब आया जब प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त 2025 में यूक्रेन का दौरा किया था। इसी दौरान मोदी ने ज़ेलेंस्की को भारत आने का औपचारिक निमंत्रण दिया था। इसके बाद दोनों देशों के अधिकारियों के बीच इस यात्रा की रूपरेखा तैयार करने के लिए कई दौर की बातचीत हुई।
अखबारों और रिपोर्टों के अनुसार, यह दौरा जनवरी 2026 में होने की संभावना है, जो ज़ेलेंस्की का भारत का पहला आधिकारिक दौरा होगा। इससे पहले 1992, 2002 और 2012 में यूक्रेन के राष्ट्रपति भारत आए थे। 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने भारत का दौरा किया था और व्यापार, ऊर्जा और तकनीकी क्षेत्र में कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे।
हालांकि अभी तक भारत या यूक्रेन की ओर से ज़ेलेंस्की के दौरे की आधिकारिक पुष्टि नहीं आई है, लेकिन तैयारियां काफी हद तक पूरी हो चुकी हैं।
भारत की संतुलित कूटनीति-President Zelensky to visit India
पुतिन के दौरे के तुरंत बाद ज़ेलेंस्की का स्वागत करना भारत की संतुलित विदेश नीति का संकेत है। रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रारंभ से ही भारत यह स्पष्ट करता रहा है कि वह इस संघर्ष में तटस्थ है और शांति चाहता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल जुलाई में रूस का दौरा किया था और उसके तुरंत बाद अगस्त में यूक्रेन भी गए। पुतिन की भारत यात्रा के दौरान मोदी ने कहा था, “भारत कभी भी पक्षपाती नहीं रहा; भारत का पक्ष शांति का है।” केवल पुतिन का दौरा करना भारत की नीति को एकतरफा दिखा सकता था। इसलिए ज़ेलेंस्की का स्वागत करना भारत की तटस्थ और संतुलित नीति का प्रतीक है।
विशेषज्ञ प्रो. राजन कुमार के अनुसार, पुतिन की भारत यात्रा के बाद पश्चिमी देशों को यह संदेश जा सकता था कि भारत रूस का समर्थन कर रहा है। ज़ेलेंस्की को आमंत्रित कर भारत इस संभावना को समाप्त करना चाहता है।
क्या मोदी रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थ बन सकते हैं?
प्रधानमंत्री मोदी ज़रूर दोनों देशों से शांति पर चर्चा करेंगे, लेकिन युद्धविराम की स्थिति बनाना आसान नहीं है।
प्रो. राजन कुमार कहते हैं, “जब युद्ध केवल रूस और यूक्रेन के बीच था, तब युद्धविराम कराना आसान था। अब इसमें NATO की सेनाएं भी शामिल हो गई हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शांति प्रयास भी पूर्ण रूप से सफल नहीं हुए। ज़ेलेंस्की और यूरोपीय नेताओं के बीच वार्ता के बाद स्थिति बदल जाती है।”
प्रो. अमिताभ सिंह बताते हैं कि भारत कोई युद्धविराम प्रस्ताव नहीं देगा क्योंकि किसी भी प्रकार के पक्षपात का आरोप भारत पर नहीं लगना चाहिए। पहले चीन और दक्षिण अफ्रीका ने ऐसी पहल की थी, लेकिन पश्चिमी देशों ने उसे रूस के पक्ष में बताया।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि मोदी ज़रूर ज़ेलेंस्की से युद्ध और शांति पर चर्चा करेंगे, ताकि भारत अपनी मध्यस्थ भूमिका निभा सके।
क्या पुतिन नाराज होंगे?
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं होगा। प्रो. राजन कुमार के अनुसार, पुतिन जानते हैं कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है। भारत ने हमेशा संघर्षों में तटस्थ रहकर अपनी नीति अपनाई है। ज़ेलेंस्की को बुलाना सिर्फ संतुलन बनाए रखने की नीति है। इससे भारत-रूस संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
जब मोदी ने पुतिन से मिलने के बाद यूक्रेन का दौरा किया था, तब भी रूस ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी। भारत ने हमेशा इस मामले में स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाया है।
युद्धविराम क्यों नहीं हो पा रहा है
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जनवरी 2024 में पद संभालने के बाद लगातार पुतिन और ज़ेलेंस्की से युद्ध रोकने की कोशिश की। बावजूद इसके, युद्धविराम संभव नहीं हो सका। इसके तीन मुख्य कारण हैं:
- क्षेत्रीय विवाद: ज़ेलेंस्की का 10-पॉइंट शांति प्लान रूस की मांगों के विपरीत है। पुतिन चाहते हैं कि डोनेट्स्क, लुहान्स्क और क्रीमिया को रूस में शामिल किया जाए। ज़ेलेंस्की इन क्षेत्रों को नहीं छोड़ना चाहते।
- आपसी अविश्वास: रूस चाहता है कि यूक्रेन NATO में शामिल न हो। ज़ेलेंस्की सुरक्षा गारंटी और युद्ध अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई चाहते हैं। दोनों नेता आपसी शर्तों पर भरोसा नहीं कर रहे।
- घरेलू दबाव: दोनों देशों में नेताओं पर यह दबाव है कि वे हार स्वीकार न करें। युद्धविराम की स्थिति में उन्हें घरेलू राजनीतिक नुकसान हो सकता है।
वैश्विक रणनीति और लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध केवल क्षेत्रीय नहीं है, बल्कि पश्चिमी देशों और रूस के बीच वैश्विक प्रभुत्व की लड़ाई भी है। अमेरिका और ब्रिटेन अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहते हैं, जबकि रूस यूरोप में अपनी स्थिति बनाए रखना चाहता है।
भारत को ज़ेलेंस्की की यात्रा से क्या लाभ होंगे?
- स्वतंत्र विदेश नीति का संदेश: भारत यह दिखा सकता है कि उसकी नीति किसी अन्य देश से प्रभावित नहीं है।
- रूस-यूक्रेन युद्ध में तटस्थता: मोदी के संवाद से यह संदेश जाएगा कि भारत किसी पक्ष का समर्थन नहीं करता, बल्कि शांति चाहता है।
- वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व: एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों में भारत का नेतृत्व और मजबूत होगा।
पुतिन की यात्रा से भारत को हुए लाभ
पुतिन के दौरे के दौरान व्यापार, ऊर्जा, विज्ञान और रक्षा क्षेत्रों में कुल 19 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए।
- लेबर मोबिलिटी: भारतीय कुशल श्रमिक रूस में आसानी से काम कर सकेंगे।
- समुद्री सहयोग: आर्कटिक क्षेत्र में शोध और नौवहन में सहयोग।
- खाद और कृषि: रूस में यूरिया प्लांट लगाना, जिससे किसानों को समय पर खाद मिले।
- रक्षा प्रौद्योगिकी: रूसी हथियारों के पार्ट्स भारत में विकसित होंगे।
- आर्थिक सहयोग: 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य।
- ऊर्जा सुरक्षा: रूस भारत को लगातार तेल सप्लाई करेगा।
इस दौरे से भारत-रूस संबंध मजबूत हुए और भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता का संदेश भी विश्व स्तर पर गया।
यह भी पढ़े: वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी स्थिर रहा india and russia relations: पीएम मोदी का बड़ा बयान
निष्कर्ष
राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की भारत यात्रा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक सुदृढ़ता और संतुलन की रणनीति का प्रतीक है। पुतिन और ज़ेलेंस्की दोनों को आमंत्रित करके भारत ने यह संदेश दिया है कि वह शांति, तटस्थता और वैश्विक नेतृत्व के लिए प्रतिबद्ध है।
प्रधानमंत्री मोदी की पहल से न केवल शांति और संवाद को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि भारत का वैश्विक स्तर पर महत्व और प्रभाव भी मजबूत होगा। यह यात्रा भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय साबित होगी।












