IFFI 2025 में ICFT–UNESCO गांधी मेडल की दौड़ में शामिल 10 वैश्विक फिल्में, शांति और मानवता की कहानियों को मिला मंच

📝 Last updated on: November 28, 2025 11:50 am
IFFI 2025

भारत का सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह—International Film Festival of India—अपने 56वें संस्करण IFFI 2025 के साथ एक बार फिर विश्व सिनेमा को जोड़ने का केंद्र बन गया है। इस वर्ष भी ICFT–UNESCO गांधी मेडल के लिए चुनी गई फिल्में दुनिया को यह याद दिलाती हैं कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और शांति का संदेश देने वाली कला है।

International Council for Film, Television and Audiovisual Communication (ICFT) के साथ साझेदारी में दिया जाने वाला यह विशेष पुरस्कार पहली बार 2016 में IFFI के 46वें संस्करण में शुरू हुआ था। आज, दस वर्षों में, यह सम्मान विश्व सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। यह उन फिल्मों को सम्मानित करता है जो महात्मा गांधी के सार्वभौमिक मूल्यों—अहिंसा, सहिष्णुता, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक संवाद—को प्रभावशाली ढंग से प्रदर्शित करती हैं।

IFFI 2025 में इस वर्ष दस फिल्मों को इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया है, जिनका चयन उनकी विषयगत गहराई, सामाजिक संदेश और मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर किया गया है।

ICFT–UNESCO गांधी मेडल की रेस में शामिल 10 फिल्में

इस वर्ष चयनित फिल्मों की सूची बेहद विविधतापूर्ण है। इनमें ब्रिटेन, नॉर्वे, कोसोवो, ईरान, इराक, चिली, जापान, बेल्जियम, फ्रांस, लक्ज़मबर्ग और भारत के निर्देशक शामिल हैं।

प्रतियोगिता में शामिल फिल्में हैं:

  • Brides (UK)
  • Hana (Kosovo)
  • K Poper (Iran)
  • The President’s Cake (USA–Iraq–Qatar)
  • Safe House (Norway)
  • Tanvi The Great (India)
  • The Wave (Chile)
  • Vimukt (India)
  • White Snow (India)
  • Yakushima’s Illusion (Belgium–France–Japan–Luxembourg)

तीन भारतीय फिल्मों का इस सूची में शामिल होना भारतीय सिनेमा की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति और बदलते नैरेटिव को दर्शाता है। ये फिल्में सामाजिक जटिलताओं, भावनात्मक संघर्षों और मानवीय जुड़ाव के बेहद संवेदनशील विषयों को छूती हैं।

गांधी मेडल: सिनेमा में शांति और करुणा का प्रतीक

ICFT–UNESCO गांधी मेडल का मकसद केवल तकनीकी या कलात्मक उत्कृष्टता का सम्मान करना नहीं है, बल्कि समाज को जोड़ने वाली उन फिल्मों को पहचान देना है जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करें।

यह पुरस्कार उन फिल्मों को मिलता है जो—

  • अहिंसा और मानवता का संदेश देती हैं
  • विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद को बढ़ावा देती हैं
  • सामाजिक न्याय, समानता और संवेदनशील विषयों को सुर्खियों में लाती हैं
  • कला के माध्यम से दुनिया में शांति का मार्ग प्रशस्त करती हैं

हर वर्ष यह पुरस्कार ऐसी फिल्मों को नई पहचान देता है जो मनोरंजन से आगे बढ़कर समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करती हैं।

IFFI 2025 के लिए ICFT–UNESCO की अंतरराष्ट्रीय ज्यूरी

इस वर्ष गांधी मेडल के विजेता का चयन एक अत्यंत अनुभवी और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण रखने वाली ज्यूरी द्वारा किया जाएगा।
ज्यूरी सदस्य हैं:

  • डॉ. प्रो. अहमद बेदजाउई (अल्जीरिया) – ज्यूरी प्रमुख
  • श्युयुआन हुन (चीन)
  • सर्ज माइकल (फ्रांस)
  • टॉबियास बियांकोन (स्विट्ज़रलैंड)
  • जॉर्ज डुपोंट (लक्ज़मबर्ग)

दुनिया के इन अलग-अलग हिस्सों से आए विशेषज्ञों में सिनेमा के प्रति गहरी समझ है, साथ ही वे उन मूल्यों को भी भली-भांति समझते हैं जिनका प्रतिनिधित्व गांधी मेडल करता है।

“भावनाओं को तकनीक से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता”-ICFT–UNESCO के प्रतिनिधि मनूज कडाम

प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो की प्रेस वार्ता में ICFT–UNESCO पेरिस के मानद प्रतिनिधि और प्रसिद्ध फिल्मकार मनूज कडाम ने इस पुरस्कार की महत्ता पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि यह मेडल उन फिल्मों को दिया जाता है जो मानवता और नैतिक मूल्यों को प्रमुखता देती हैं।

उन्होंने कहा कि—

“सिनेमा केवल दृश्य प्रभाव नहीं है। यह भावनाओं, संघर्षों और संवेदनाओं का संगम है, जिसे कोई मशीन या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कभी पूरी तरह नहीं समझ सकता। AI मदद कर सकता है, लेकिन भावनाएं कंप्यूटरीकृत नहीं हो सकतीं।”

यह बयान वैश्विक फिल्म उद्योग में उभर रही AI बहस के बीच बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया भर में तकनीक और रचनात्मकता के संतुलन को लेकर चर्चाएँ चल रही हैं, और IFFI 2025 इस संवाद को एक संवेदनशील दिशा देने की कोशिश कर रहा है।

कडाम ने यह भी बताया कि 2025 ICFT और IFFI की साझेदारी का ग्यारहवां वर्ष है—एक ऐसी साझेदारी जो लगातार मानवता और वैश्विक एकता को बढ़ावा देने वाली फिल्मों को प्रोत्साहित कर रही है।

फिल्म महोत्सवों की नैतिक जिम्मेदारी: NFDC के निर्देशक पंकज सक्सेना का दृष्टिकोण

NFDC के प्रोग्रामिंग आर्टिस्टिक डायरेक्टर पंकज सक्सेना ने भी गांधी मेडल की विशिष्टता पर जोर देते हुए कहा कि यह IFFI के तीन प्रमुख प्रतिस्पर्धी वर्गों में से एक है, और इसका उद्देश्य दुनिया की सभ्यताओं को जोड़ने वाले संवाद को मजबूत करना है।

सक्सेना ने कहा कि—

  • फिल्म महोत्सवों को कलात्मक स्तर को उन्नत करना चाहिए
  • दर्शकों को मानवीय संवेदनाओं से भरपूर सिनेमा से जोड़ना चाहिए
  • हिंसा दिखाना गलत नहीं, लेकिन उसका प्रस्तुतीकरण संवेदनशील और ज़िम्मेदार होना चाहिए

उन्होंने उल्लेख किया कि फिल्मों में महिलाओं की आवाज़ मजबूत हो रही है। IFFI 2025 में महिलाओं द्वारा निर्देशित या नेतृत्व वाली फिल्मों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। यह वैश्विक सिनेमा के बदलते स्वरूप को दर्शाता है, जिसमें विविधता और समावेशन को महत्व दिया जा रहा है।

दुनिया को जोड़ने वाला मंच: IFFI 2025 का महत्व

इस वर्ष प्रदर्शित होने वाली दस फिल्मों में से प्रत्येक अपनी कहानी में एक अनूठा मानवीय संदेश समेटे हुए है। चाहे वह राजनीतिक संघर्ष हो, सामाजिक विषमता, व्यक्तिगत दर्द, सांस्कृतिक टकराव, या आत्म-खोज—हर फिल्म अपने तरीके से समाज को आईना दिखाती है।

IFFI 2025 केवल एक फिल्म महोत्सव नहीं, बल्कि एक ऐसा सांस्कृतिक संगम है जहां—

  • भावनाएँ सीमाओं से परे जाती हैं
  • कहानियाँ समाज में संवाद की शुरुआत करती हैं
  • कला लोगों को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम बनती है

ICFT–UNESCO गांधी मेडल इसी विचार का प्रतिनिधित्व करता है कि सिनेमा शांति का दूत बन सकता है और मानवता के बीच अदृश्य पुलों का निर्माण कर सकता है।

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निष्कर्ष: किसे मिलेगा गांधी मेडल?

अब दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस वर्ष ICFT–UNESCO गांधी मेडल किस फिल्म को मिलेगा।
लेकिन असली महत्व केवल पुरस्कार जीतने में नहीं है, बल्कि उन कहानियों में है जो दर्शकों के दिलों में संवेदना, करुणा और समझ का संचार करती हैं।

IFFI 2025 एक बार फिर साबित करता है कि सिनेमा केवल दृश्य तकनीक का खेल नहीं—यह दुनिया को बेहतर दिशा दिखाने की शक्ति रखने वाली कला है।