Protest in Gujarat against the film Dhurandhar: अदित्य धर द्वारा निर्देशित और हाल ही में रिलीज़ हुई हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’ ने गुजरात में एक बड़े सामाजिक विवाद को जन्म दे दिया है। फिल्म में संजय दत्त द्वारा बोले गए एक संवाद ने जुनागढ़ और पूरे गुजरात के बलूच मकराणी समाज को गहराई से आहत किया है, जिसके बाद समुदाय ने फिल्म के निर्माताओं, लेखक और कलाकारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज कर दी है।
देश-भर में चर्चा में आया यह मुद्दा अब उस स्तर तक पहुँच चुका है कि अगर प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो समाज गुजरात हाई कोर्ट का रुख करेगा। इस विवाद ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान खींचा है क्योंकि सोशल मीडिया पर “Protest in Gujarat against the film Dhurandhar” तेजी से वायरल हो रहा है।
विवाद की शुरुआत: वह संवाद जिसने भड़काया आक्रोश
फिल्म का वह संवाद जिसे समुदाय ने अपमानजनक बताया, इस प्रकार है:
“हमेशा बोलता हूँ बड़े साहब… मगरमच्छ पर भरोसा किया जा सकता है, मगर बलोच पर नहीं।”
बलूच मकराणी समाज का कहना है कि यह कथन एक विशेष जातीय समुदाय को अपमानित करने और उसे नीचा दिखाने का प्रयास है। यह संवाद न केवल गलत छवि प्रस्तुत करता है, बल्कि करोड़ों बलूचों की सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक सम्मान को चोट पहुँचाता है।
जूनागढ़ बलूच मकराणी समाज के प्रमुख और अधिवक्ता एजाज मकरानी ने इस बयान को अपराध करार देकर फिल्म के अभिनेता, संवाद लेखक और निर्देशक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए तालुका पुलिस स्टेशन में आधिकारिक आवेदन जमा कराया है। उन्होंने कहा कि मीडिया और मनोरंजन उद्योग की ज़िम्मेदारी होती है कि वह किसी भी जातीय या सांस्कृतिक समूह को लक्ष्य बनाकर नकारात्मक छवि न बनाए।
क्यों भड़का इतना बड़ा विरोध?
बकौल समुदाय, यह संवाद केवल मनोरंजन के नाम पर बोले गए शब्द नहीं थे-बल्कि यह संपूर्ण बलूच समाज की पहचान पर सीधा प्रहार था। गुजरात में लगभग 8 लाख से अधिक बलूच मकराणी रहते हैं, जबकि पूरे भारत में उनकी आबादी 1.5 करोड़ से अधिक बताई जाती है। इतनी बड़ी जनसंख्या वाले समुदाय को जब अपमानजनक तरीके से पेश किया गया, तो स्वाभाविक रूप से व्यापक क्रोध उमड़ पड़ा।
सामुदायिक नेताओं का कहना है कि अगर किसी भी विशेष जातीय या सांस्कृतिक समूह को फिल्मों में बार-बार गलत तरीके से चित्रित किया जाता रहा, तो इससे समाज में गलतफहमियाँ पनपेंगी, नफरत बढ़ेगी और सामाजिक सौहार्द को गहरा नुकसान पहुंचेगा।
जूनागढ़ में विरोध तेज-जिला प्रशासन को सौंपा जाएगा ज्ञापन
बढ़ते विवाद के बीच, समुदाय ने निर्णय लिया है कि वे जिला प्रशासन को विस्तृत ज्ञापन सौंपेंगे। साथ ही चेतावनी दी गई है कि
अगर 10 दिनों के भीतर उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो वे गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर करेंगे।
समुदाय का दावा है कि वे फिल्म के आपत्तिजनक संवादों को हटाए बिना समझौता नहीं करेंगे। उनका कहना है कि यह केवल एक फिल्म का मामला नहीं है, बल्कि समाज की प्रतिष्ठा और पीढ़ियों की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है।
सोशल मीडिया पर हैशटैग “Protest in Gujarat against the film Dhurandhar” तेजी से ट्रेंड कर रहा है, जिसमें युवाओं और सामाजिक संगठनों की भागीदारी बढ़ती जा रही है।
समाज की नाराज़गी: कमाई के लिए एक जाति को निशाना बनाया गया
समुदाय के प्रमुख एजाज मकरानी ने मीडिया से बातचीत में कहा
“हमारा समाज शांतिपूर्ण है। लेकिन केवल पैसे कमाने के लिए फिल्म में हमारी पहचान को बदनाम करना अस्वीकार्य है। यह जानबूझकर किया गया प्रयास लगता है।”
उन्होंने आगे कहा कि फिल्म के संवाद लेखक और निर्देशक को यह समझना चाहिए कि किसी समुदाय के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़ना है।
समुदाय के बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं ने भी फिल्म का विरोध करते हुए कहा कि इस तरह के संवाद आने वाली पीढ़ियों को गलत संदेश देंगे और समाज में उनके खिलाफ पूर्वाग्रह को बढ़ाएंगे।
फिल्म ‘धुरंधर’ की कहानी-वास्तविक घटनाओं से प्रेरित
फिल्म की पृष्ठभूमि दो बड़े ऐतिहासिक वाकयों
- 1999 के IC-814 विमान अपहरण, और
- 2001 के भारतीय संसद हमले
से प्रेरित बताई जाती है। फिल्म की मुख्य कहानी एक अंडरकवर मिशन पर केंद्रित है, जहाँ भारतीय गुप्तचर एजेंसी का शीर्ष अधिकारी अजय सान्याल (आर. माधवन) पाकिस्तान में फैली आतंकवादी गतिविधियों और अंडरवर्ल्ड नेटवर्क को खत्म करने की योजना बनाता है।
इस मिशन के लिए एक ऐसे युवा की जरूरत होती है जिसकी कोई पहचान न हो और जिसका अतीत अपराध से जुड़ा रहा हो। यही तलाश उन्हें हमज़ा (रणवीर सिंह) तक ले जाती है। संजय दत्त फिल्म में कराची के एसपी चौधरी असलम की भूमिका निभा रहे हैं, जहां से वह विवादित संवाद बोला जाता है।
फिल्म के पहले भाग में अंडरवर्ल्ड, अपराध और हिंसा दिखाई गई है, जबकि दूसरे भाग में जासूसी, राजनीति और धोखे का खेल दिखाया गया है। कहानी दर्शकों को लगातार उत्सुक बनाए रखती है।
लेकिन फिल्म की कहानी से परे, अब पूरा ध्यान उस विवाद पर केंद्रित हो गया है जिसने गुजरात में भारी तनाव उत्पन्न कर दिया है।
गुजरात में बलूच मकराणी समाज: एक शांतिपूर्ण और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध समुदाय
इस विवाद को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि बलूच मकराणी समाज का इतिहास और पहचान क्या है।
यह समुदाय मूलतः बेलूचिस्तान के मकरान क्षेत्र से आया है। सदियों पहले स्थानांतरण की वजह से ये लोग भारत के विभिन्न हिस्सों में बस गए। गुजरात में इनकी आबादी सबसे अधिक है—जूनागढ़, भावनगर, कच्छ, राजकोट, सुरत, अहमदाबाद आदि में बड़ी संख्या में यह समाज रहता है।
इतिहासकारों के अनुसार बलूच समुदाय स्वयं को पैगंबर इब्राहिम के वंशज मानता है, जिनका प्रारंभिक निवास सीरिया का क्षेत्र बताया जाता है। कई ऐतिहासिक वृतांतों में उनका संबंध मध्य एशिया, ईरान और बलूचिस्तान से जोड़ा गया है।
समुदाय की अपनी अलग भाषा, संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाज हैं जो आज भी पीढ़ियों तक सुरक्षित हैं।
ऐसे समुदाय पर अगर किसी फिल्म में निशाना साधा जाता है, तो स्वाभाविक है कि प्रतिक्रिया तीखी होगी और गुजरात में हो रहे विरोध (Protest in Gujarat against the film Dhurandhar) का स्वर तेज होता जाएगा।
इतिहास में बलूचों की भूमिका-मुगल शासन, प्राचीन रियासतें और भारत से संबंध
इतिहास में बलूच समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
- मुगल काल में बलूच जनजातियों ने कई युद्धों में योगदान दिया।
- कलात राज्य में सेवा राजवंश का शासन था जिनके विरुद्ध मुगल सम्राट अकबर ने बलूचों की मदद से अभियान चलाया।
- समय के साथ बलूच जनजातियों ने कई क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाया और बाद में बलूचिस्तान को स्वराज की मांगों का केंद्र माना गया।
भारत विभाजन के समय भी बलूचिस्तान के पाकिस्तान में जबरन विलय को लेकर दशकों से विवाद चलता रहा है। कई बगावती संगठनों ने स्वतंत्र बॉलूचिस्तान की मांग उठाई, जिस पर पाकिस्तान आज भी भारत पर हस्तक्षेप का आरोप लगाता है।
इतिहास इतना जटिल और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील होने की वजह से, आज भी बॉलूचों की पहचान को लेकर किसी भी नकारात्मक चित्रण को समुदाय सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता।
क्या यह केवल एक फिल्म का विवाद है या एक बड़ा सामाजिक संदेश?
फिल्मों का समाज पर गहरा प्रभाव होता है। यही कारण है कि बॉलूच समुदाय इस संवाद को एक साधारण लाइन नहीं, बल्कि अपनी सामूहिक छवि पर हमला मान रहा है। उनके लिए यह मुद्दा प्रतिष्ठा और सम्मान का है।
सवाल यह भी है कि क्या फिल्म निर्माताओं ने वास्तविकता और कल्पना के बीच संतुलन नहीं रखा? क्या वे संवेदनशील मुद्दों पर शोध किए बिना संवाद लिख देते हैं?
अगर ऐसा है, तो यह केवल बॉलूच समुदाय का नहीं, बल्कि हर उस समुदाय का सवाल बन जाता है जिसे फिल्मों में गलत तरीके से दिखाया जाता है।
गुजरात में बढ़ता जनसमर्थन: विरोध की लहर अन्य शहरों तक फैली
जूनागढ़ में शुरू हुआ यह विरोध अब धीरे-धीरे गुजरात के अन्य जिलों तक फैल रहा है। सोशल मीडिया पर लोग फिल्म बहिष्कार की अपील कर रहे हैं। कई युवा संगठनों ने भी बयान जारी कर कहा कि अगर फिल्म निर्माता माफी नहीं मांगते और संवाद नहीं हटाते, तो आंदोलन और तेज होगा।
कई नागरिक समूहों ने भी कहा है कि किसी भी समुदाय का अपमान मनोरंजन के नाम पर उचित नहीं है। यह मामला अब केवल बॉलूचों तक सीमित नहीं रहकर व्यापक सामाजिक बहस का विषय बन गया है।
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क्या फिल्म पर प्रतिबंध लग सकता है?
समुदाय की मांग है:
- विवादित संवाद हटाए जाएं
- कलाकार और निर्देशक सार्वजनिक माफी मांगे
- फिल्म पर अस्थायी रोक लगाई जाए
- सेंसर बोर्ड यह स्पष्ट करे कि ऐसा संवाद कैसे पास हुआ
अगर प्रशासन कार्रवाई में देरी करता है, तो संभावना है कि यह मामला कानूनी स्तर पर तेजी से आगे बढ़ेगा।
आगे क्या?
फिलहाल गुजरात पुलिस मामले की शिकायत की समीक्षा कर रही है। लेकिन समुदाय अपनी मांगों पर अडिग है। आने वाले दिनों में गुजरात में होने वाले विरोध प्रदर्शनों (“Protest in Gujarat against the film Dhurandhar”) के और बड़े होने की संभावना है।
यह विवाद भारतीय फिल्म उद्योग के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है कि
मनोरंजन के नाम पर किसी भी जातीय, धार्मिक या सांस्कृतिक समुदाय का अपमान समाज को विभाजित कर सकता है।
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निष्कर्ष-Protest in Gujarat against the film Dhurandhar
फिल्म ‘धुरंधर’ में बोले गए एक मात्र संवाद ने गुजरात में एक बड़े और गंभीर सामाजिक आंदोलन को जन्म दे दिया है। बॉलूच मकराणी समाज ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी पहचान का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे।
यह विवाद केवल फिल्म का नहीं, बल्कि भारतीय समाज में सम्मान, संवेदनशीलता और जिम्मेदार अभिव्यक्ति का भी प्रश्न है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन, फिल्म निर्माता और उच्च न्यायालय इस विवाद को किस दिशा में ले जाते हैं।











